पवित्र बाइबल

विलाप की लंबी रात

(यह कहानी विलापगीत के प्रथम अध्याय की भावना और छवियों पर आधारित एक मौलिक कल्पना है।)

हवा में धूल के कण तैर रहे थे, जैसे सूरज की रोशनी में नाचती हुई राख। यरूशलेम की वह सड़क, जहाँ कभी त्योहारों के जुलूस निकलते थे, अब सन्नाटे से पटी पड़ी थी। उसकी पटरियों पर पत्थरों के बीच कहीं से एक जंगली पौधा निकल आया था, हरेपन का एक अटपटा, जिद्दी धब्बा। शामा दरवाजे के पास एक ऊँची चट्टान पर बैठी थी। उसकी आँखें शहर की ओर थीं, पर देख कुछ और ही रही थीं।

वह सुन सकती थी उन पुराने दिनों की आवाज़ें। रात के समय बाज़ार की गूँज, सोने-चाँदी के बरतनों की खनक, बच्चों के खिलखिलाते हँसने की आवाज जो गलियों में लुढ़कती फिरती। अब केवल खामोशी थी। बस कभी-कभार किसी टूटे हुए फाटक का एक तख्ता हवा से टकराकर कराह उठता। वह शहर अब एक सूनी विधवा जैसा लगता था। शामा को याद आया, कैसे उसके बचपन में यह नगरी राजकुमारी की तरह दिखती थी, बैंगनी और सुनहरे वस्त्र पहने, जिसके चारों ओर सम्मान के लोग खड़े रहते। अब उसके वस्त्र फटे हुए थे, धूल से सने।

उसने अपनी बाँह पर पड़े एक निशान को देखा, एक पुराना जख्म जो कभी नहीं भरा। दुश्मनों की तलवारों के निशान तो सब पर थे ही, पर एक और दर्द था, भीतरी, गहरा। वह अकेलापन। पड़ोसी राज्यों के लोग, जो कभी मित्र थे, अब दूर भागते थे। कोई सहारा देने नहीं आता था। जैसे महामारी फैलने पर लोग रोगी को छोड़ देते हैं, वैसे ही सबने इसे त्याग दिया था। शामा का मन उन यादों में डूब गया जब वह और उसकी सहेलियाँ सुलैमान के बागों की सैर करती थीं। अब वे बाग उजाड़ थे, फलदार पेड़ों की जगह कंटीली झाड़ियों ने ले ली थी।

शामा की नज़र शहर के उत्तर की ओर गई, जहाँ से दुश्मन आए थे। वह रास्ता अब भी खुला पड़ा था, जैसे कोई गहरा घाव। उसे वह रात याद आई जब आकाश लाल हो गया था, धुएँ और चीखों से भरा। मन्दिर… वह सोच ही रही थी कि उसकी साँस रुक सी गई। सोने का सन्दूक, दीवटें, वह पर्दा… सब धूल में मिल गए। उनके पापों की गन्ध ही इतनी तेज़ थी कि परमेश्वर की उपस्थिति वहाँ ठहर न सकी। यही सबसे बड़ा दंड था। दुश्मनों की तलवारें तो एक बात थीं, पर प्रभु का मुख मोड़ लेना… यह तो ऐसा था जैसे सूरज ही बुझ गया हो।

वह उठी और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। पैरों तले मलबा चरमराया। एक टूटा हुआ खिलौना उसे दिखाई दिया, लकड़ी का घोड़ा, जिसकी एक आँख लापता थी। उसे अपने बेटे योनातान की याद आ गई। वह कहाँ था? बन्दी बना लिया गया था, या… वह सोचना भी नहीं चाहती थी। उसकी आँखों से आँसू नहीं टपके। वे तो कब की सूख चुके थे, जैसे गर्मी में सूख जाने वाली नदी का तल.

तभी दूर से एक आवाज़ आई। कोई बूढ़ा व्यक्ति, शायद यिरम्याह भविष्यद्वक्ता ही होंगे, टूटी हुई दीवार के सहारे खड़ा विलाप कर रहा था। उसकी आवाज़ टूटी-फूटी थी, पर शब्द स्पष्ट थे: “देखो, हे सब राह चलते लोगो, क्या तुम्हारे दिल में भी ऐसा ही दर्द नहीं उठता?” शामा ने सिर झुका लिया। उसका दिल तो पहले ही टूट चुका था। उसे अब अपने ही पापों का एहसास था, जैसे पेट में पत्थर पड़ा हो। कितनी बार चेतावनी दी गई थी। कितनी बार भविष्यद्वक्ताओं ने पुकारा था। पर सबने अनसुना कर दिया। उन्होंने दूसरे देवताओं के पीछे भागना चुना, अस्थायी चमक-दमक के पीछे। अब उसकी कीमत चुकानी पड़ रही थी।

शामा ने आकाश की ओर देखा। बादलों की एक पतली पट्टी सूरज को ढँक रही थी। उसे एक प्रार्थना याद आई, बचपन में सीखी हुई। होंठ हिले, पर शब्द न निकले। प्रार्थना करने का साहस भी कहाँ रह गया था? वह तो एक भटकी हुई भेड़ की तरह थी, जो अपने चरवाहे की आवाज़ पहचानना भूल गई हो।

अचानक उसे लगा जैसे यह सब एक लम्बी रात का सपना है। पर यह सपना सच था। यह उजाड़, यह चुप्पी, यह लज्जा। दिन ढलने लगा था। लम्बी-लम्बी परछाइयाँ गलियों में फैल रही थीं। शामा ने अपने चारों ओर देखा। यह वही शहर था न? वही पहाड़, वही आकाश। पर सब कुछ बदल गया था। जैसे किसी ने जीवन का रंग ही उड़ा दिया हो।

वह फिर से उसी चट्टान पर बैठ गई। रात के अँधेरे में शहर और भी अकेला दिखाई देगा। उसे पता था, यह विलाप समाप्त नहीं हुआ है। यह तो एक लम्बे शोक का प्रारम्भ है। पर उसकी आँखों में एक झलक दिखाई दी, बहुत ही धुँधली, जैसे दूर क्षितिज पर बिजली की एक कौंध। शायद… केवल शायद… यह दंड हमेशा के लिए नहीं है। शायद यही पिसी हुई भावना, यही टूटा हुआ मन, एक नई शुरुआत की जगह बने। पर अभी नहीं। अभी तो केवल रात थी, और रात का सन्नाटा। और एक नगर, जो अपने ही पापों के बोझ तले कराह रहा था। हवा ने एक कराहनुमा सी आवाज़ की, और शामा ने अपनी चादर को कसकर शरीर से लपेट लिया।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *