वह दिन ऐसे शुरू हुआ जैसे बीते हुए कई दिन—धूप तेज, हवा में धूल के कण तैरते, और शहर की गलियों से आती हलचल की एक नीरस गूँज। अमर एक छोटी सी दुकान पर बैठा, हिसाब-किताब की कॉपियों पर नजर दौड़ाता, पर मन कहीं और था। एक तरह की प्यास, जो पानी से नहीं बुझती थी, उसके भीतर घर कर गई थी। पैसा तो कमा लेता था, पर संतुष्टि नाम की चीज हाथ से फिसलती जा रही थी, जैसे रेत के दाने।
दोपहर बीते, उसने दुकान बंद की और शहर के बाहर, एक छोटी सी पहाड़ी की तरफ निकल गया, जहाँ एक पुराना कुआँ था। वहाँ बैठकर वह अक्सर सोचता—इस दौड़ती-भागती जिंदगी का मतलब क्या है? आखिर खोज रहा हूँ क्या? आसपास का वातावरण शांत था, बस कभी-कभी पत्तों की सरसराहट और दूर कहीं एक पक्षी का स्वर।
तभी उसके मन में, पुरानी यादों के किसी कोने से, एक वाक्य उभरा—”हे सब प्यासों, पानी के पास आओ।” वह वाक्य उसे कहीं पढ़ा हुआ लगा, शायद बचपन में दादी द्वारा सुनाई गई किसी कहानी में। पर आज वह वाक्य उसके भीतर एक अजीब सी गूँज पैदा कर गया। उसने आँखें बंद कीं। कल्पना में, वह खुद को एक विशाल, हरे-भरे मैदान के किनारे खड़ा पाया, जहाँ एक नदी बह रही थी—पानी साफ, जिसमें आकाश का प्रतिबिंब झिलमिला रहा था। नदी के किनारे लोग इकट्ठा थे, कोई हाथ में मटका लिए, कोई बस पानी में हाथ डालकर तृप्ति का अनुभव कर रहा था। और एक आवाज, जो हवा के झोंके की तरह कोमल पर दृढ़ थी, कह रही थी—”आओ, तुम जो पैसे खर्च करके वह खरीदते हो जो तृप्ति नहीं देता, आओ और बिना मूल्य लिए दाखरस और दूध पियो।”
अमर की आँखें खुल गईं। चारों तरफ शाम की लाली फैल रही थी। वह वाक्य उसके मन में गूंजता रहा—”बिना मूल्य लिए।” उसकी पूरी जिंदगी तो एक सौदेबाजी थी—इतना कमाओ, इतना पाओ, इतना दो, इतना लो। पर यहाँ… बिना मूल्य? उसने हमेशा समझा था कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए कोई न कोई कीमत चुकानी होगी, कोई कर्मकांड, कोई बड़ा त्याग। पर यह निमंत्रण सीधा और सरल था—बस आओ।
अगले कुछ दिन, अमर एक अजीब सी बेचैनी से भर गया। वह नदी के किनारे की उस कल्पना में बार-बार लौटता। एक शाम, जब बादल गरज रहे थे और हवा में पहली बारिश की सोंधी महक आ रही थी, वह फिर उस पहाड़ी पर गया। बारिश की बूंदें गिरनी शुरू हुईं, धरती से मिट्टी की सुगंध उठी। और उसने स्वयं को उस निमंत्रण का जवाब देते पाया—एक मूक, भीतरी हाँ। कोई नाटकीय दृश्य नहीं हुआ, न कोई आकाशवाणी। बस एक शांति, जैसे भीतर की एक गाँठ खुल गई हो।
धीरे-धीरे, उसके जीवन में बदलाव आने लगा। पहले जहाँ वह हर चीज का हिसाब रखता था, अब वह छोटी-छोटी चीजों में आनंद खोजने लगा—चाय की चुस्की में, किसी बुजुर्ग की मदद करने में, अपने बच्चों की हँसी में। उसे लगा जैसे उसने अपने जीवन की दिशा बदल ली हो। वह अब उस चीज के पीछे भागता नहीं था जो तृप्त नहीं करती। उसकी प्यास, उस नदी के पानी से बुझने लगी थी, जो उसके भीतर ही बह रही थी।
एक रात, चाँदनी में, वह फिर उसी कुएँ के पास बैठा था। उसने सोचा—हमारे विचार, हमारे मार्ग, ईश्वर के विचारों और मार्गों से कितने भिन्न हैं। हम तो छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं, वह तो समुद्र जैसे विशाल और आकाश जैसे उदार हैं। जैसे बारिश की बूंदें धरती पर गिरकर अनाज उगाती हैं, वैसे ही उसके वचन हमारे जीवन में फलते-फूलते हैं। हम बस इतना कर सकते हैं कि उसके पास आएँ, सुनें, और अपना मन उसके लिए खोल दें।
अमर ने आँखें उठाकर तारों भरे आकाश को देखा। उसे लगा जैसे पूरी सृष्टि एक गीत गा रही हो—पहाड़ और पेड़ ताल दे रहे हों, नदियाँ सुर मिला रही हों। उसका अपना जीवन, एक समय जो सूखी धरती जैसा लगता था, अब हरा-भरा हो रहा था। और वह निमंत्रण अब भी गूँज रहा था, समय और स्थान से परे—सब प्यासों के लिए, सब भूखों के लिए। बस आओ। बिना किसी शर्त के। बिना किसी मूल्य के। क्योंकि तृप्ति का स्रोत तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे निकट ही है, बस हाथ बढ़ाना है और पी लेना है उस जल को, जो सच्ची प्यास बुझाता है।




